मेरे करीब ना आअो के मैं शरावी हूँ

this ghazal has been ringing in my ears since early in the morning, no idea from where, so i need to get it out of my system before i start my working day, so listened to it a few times while transcribing. and this is my own transcription so there could be errors (i hope not)...you might be able to hear it online but didn't bother searching for the links (i have it on itunes 😛 ). so here it goes...

मेरे करीब ना आअो के मैं शरावी हूँ
मेरा शऊफ जगाअो के मैं शरावी हूँ

जमाने भर की निगाहोंसे गिरचुका हूँ मैं
नजर से तुम न गिराअो के मैं शरावी हूँ

ये अर्ज करता हूँ गिर के खुलूस वालों से
उठा सको तो उठाअो के मे शरावी हूँ

तुम्हारी आँख से भरलूँ सुरूर आँखों में
नजर नजर से मिलाअो के मैं शरावी हूँ